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रामायण मङ्गळ स्लोका: |
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स्वस्ति प्राजाब्य परिपालयन्ताम् |
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न्याय्येन् मार्गेन् महीं महीशा |
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गो ब्राह्मणेब्यो सुभमस्तु नित्यम् |
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लोकास्समस्ता: सुखिनो भवन्तु |
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काले वर्षतु पर्जन्य: पृथ्वी सस्यचालिनी |
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देशोयां क्षोभरहितो ब्राह्मणा सन्तु निर्भया: |
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कावेरी वर्त्तताम् काले काले वर्षतु वासव: |
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श्रीरङ्गनाथो जयतु श्रीरङ्ग श्रीच्च् वर्त्त्ताम् |
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चरितं श्रीरघुनाथस्य् शतकोठि प्रविस्तरम् |
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एकैकमक्षर प्रोक्तं महापातक नाशणम् |
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शृण्वन् रामायणं भक्त्या य:पादं पदमेववा |
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स यादि ब्राह्मण: स्थानं ब्रह्मणा पूज्यते सदा |
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रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेद्से |
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रगुनाथाय नाथाय सीताया: पथये नम: |
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मङ्कळ्ं कोशलेन्द्राय महनीय् गुणात्मने |
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चक्रवर्त्ती तनुजाय सर्व भौमाय् मङ्कळम् |
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वेदवेदान्द् वेद्याय् मेघश्यामळ मूर्थये |
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पुम्साम् मोहनरूपाय पुण्य श्लोकाय मङ्कळम् |
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विस्वामित्रान्त् रङ्गाय मिथिला नगरीपथे |
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भाक्यानां परिपागाय भव्यरूपाय् मङ्कळम् |
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प्रित्रुभक्ताय् सततम् भ्रातृभि: सह सीतया |
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नन्दिताखिल लोकाय रामभद्राय मङ्कळ्म् |
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श्रीमते रगुवीराय् सेतुल्लाङ्कित सिन्दवे |
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जितराक्षस राजा रणदीराय मङ्कळम् |
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आसाद्य् नगरीं दिव्याम् आभिक्षिकदाय् सीतया |
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राजातिराजराजाय रामभद्राय् मङ्कळम् |
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मङकळासासन परै: मदाचार्य् पुरोगमै: |
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सर्वैस्च्च् पूर्वैराचार्यै सत्कृतोयास्तु मङ्कळम् |
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